Stop Complaining: They Are Mirrors That Give You a Chance to Change Yourself
शिकायतें खत्म करो: वो आईना हैं जो तुम्हें बदलने का मौका देते हैं
हमारी ज़िंदगी शिकायतों से भरी पड़ी है। जो सुबह उठते ही शुरू हो जाती है जैसे "ये अलार्म इतनी जल्दी क्यों बज जाता है" फिर "रास्ते मे इतना जाम क्यों है?, फिर ऑफिस मे "बॉस ने इतना काम दे दिया", "आज इतनी तारीख हो गयी सैलरी अभी तक नहीं आयी", "ये सरकार कुछ नहीं करती", "मेरी तो किस्मत ही खराब है", "लोगो को बहुत आसानी से मिल जाता है मुझे क्यों नहीं मिलता" और सोने तक यह सिलसिला चलता रहता है। पर क्या अपने सोचने की कोशिश कि आपकी सब शिकायते जा कहाँ जा रही है? क्या हवा मे गुम हो जाती है? या फिर किसी ऐसे के पास पंहुचती है जो हमारी मदद कर सके?
सच तो ये है कि हमारी ज्यादातर शिकायतें एक खाली कुएँ में फेंके गए पत्थर की तरह हैं। बस कुछ पल की आवाज़ होती है और फिर सब शांत हो जाता है। उस आवाज़ से सिर्फ हमारा ही मानसिक संतुलन खराब होता है। दिमाग बुरे और दूसरो के लिए गलत विचारों से भर जाता है। कोई अच्छा करने कि कोशिश भी करें उसमे भी बुरा ही दिखता है, वजह हमने इतनी शिकायते जो की है।
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शिकायत क्या है? हमारा भ्रम या संकेत?
शिकायत को आम भाषा मे किसी बात से असंतोष जताना कहते हैं। पर जो मनोविज्ञान है वो इसे अलग नजरिये से देखते है। उनके अनुसार शिकायत करना असल मे हमारी हार या नाकामयाबी को ना अपनाने का एक सुरक्षा तंत्र है। जब भी हम किसी बाहर की चीज़ जैसे किसी आदमी, हालत या किस्मत को देते है तो हम अपनी ज़िम्मेदारी से आज़ाद हो जाते है। कई बार इससे झूठी तसल्ली भी मिलती है, मैंने तो अपनी पूरी कोशिश कर ली, पर सामने वाला .........।────────────────────────────────────
कहानी: एक बदकिस्मत किसान की
एक समय की बात है, एक गांव मे एक किसान रहता था जो हमेशा ही अपनी बदकिस्मती का रोना रोता रहता था। वह बहुत परेशान होकर एक संत के पास गया और अपनी समस्या बताई। संत ने उससे बोला, "मैं तुम्हारी हर एक शिकायत पर तुम्हें एक सोने का सिक्का दूंगा, लेकिन एक शर्त पर"। उसने संत से शर्त पूछी, संत ने बोला कि, "शिकायत तुम्हें उस चीज़ के पास जाकर करनी होगी जिसकी तुम शिकायत कर रहे हो।"
किसान ने शर्त सुनी और वह खुशी से उसे पूरा करने के लिए तैयार हो गया। पहली शिकायत उसने कि, "बारिश नहीं हो रही, फसल सूख रही है।" संत ने कहा, "जाओ, बादलों से शिकायत करो।" किसान पूरा पहाड़ चढ़ गया और आकाश की तरफ देखकर चिल्लाया, "अरे बादल, तुम क्यों नहीं बरसते?" उसे जवाब मे सिर्फ तेज हवा कि आवाज़ ही सुनाई दी।
दूसरी शिकायत थी, "मेरी बीवी मेरी बात नहीं सुनती।" संत ने कहा, "जाओ, उसी के सामने शिकायत करो।" पहले वह पहले थोड़ा झिझका पर उसे संत कि बात पर यकीन भी था। शिकायत सुनते ही उसकी पत्नी ने पलटकर जवाब दिया, "जब तुम खुद मेरी एक बात नहीं सुनते, तो मैं तुम्हारी क्यों सुनूँ?"
तीसरी शिकायत थी,"मेरा बेटा पढ़ाई में कमजोर है।" संत ने फिर बोला, "जाओ, उसी के सामने शिकायत करो।" वह अपने बेटे के पास गया और अपनी बात शिकायत बोल दी। बेटे ने जवाब दिया कि "पापा, तुम कभी समय नहीं देते मुझे पढ़ाने के लिए।"
ऐसे ही कई दिनों तक चलता रहा। वह हर एक चीज़ के सामने शिकायत करता जिसे वह दोष देता था जैसे जमीन, बीज, पडोसी। हर बार उसे ऐसा जवाब मिलता जो उसे अंदर से झकझोर देता। अंत मे उसने हार मन ली और संत के पास वापिस गया और बोला, "महाराज, मैंने सोने के सिक्के नहीं, एक सोने सी कीमती एक सीख पाई है। जिस भी चीज़ की मैं शिकायत करता था, वह कोई समस्या थी ही नहीं। असली समस्या मेरा नजरिया था। मैं अपनी कमियों को छुपाने के लिए बस दूसरों को दोष देता था।
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शिकायत असल मे करनी किस से है?
हम सोचते हैं कि हम दूसरों से शिकायत कर रहे हैं। पर असल में, हम खुद से शिकायत कर रहे होते हैं। जब हम कहते हैं, "बॉस मुझे प्रमोट नहीं करता", तो असल में हम खुद से कह रहे होते हैं, "मैं इतना योग्य नहीं हूँ कि बॉस की नज़र में चढ़ सकूँ।" जब हम कहते हैं, "जीवनसाथी मुझे समझता नहीं", तो वास्तव में हम खुद से शिकायत कर रहे होते हैं कि "मैं उसे समझाने में असमर्थ हूँ।"
शिकायत एक आईना है, जो हमारे अंदर के डर, असुरक्षा और असमर्थता को दिखाता है, बस हम उसे देखना नहीं चाहते। इसलिए शिकायत का निशाना बदल देते हैं।
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शिकायत में सुधार क्यों ज़रूरी है?
- ऊर्जा बर्बाद होती है: शिकायत करना जब स्वभाव बन जाता है, तब जो ऊर्जा समस्या का समाधान ढूंढ़ने मे लगनी चाहिए थी, वह सारी शिकायत करने मे ही बर्बाद हो जाती है।
- माहौल खराब होता है: जो भी इंसान लगातार शिकायते करता रहता है, उसके आसपास का माहौल बहुत खराब हो जाता है। लोग उससे दूर ही भागने लगते है।
- हीन भावना आती है: शिकायत हमे एक 'शिकार' बना देती है। हम अपनी ताकत को भूलकर खुद को हालात की मारी हुई कठपुतली समझने लगते हैं। जिससे हीन भावना आती है।
- विकास रुक जाता है: जब सभी चीज़ो कि गलती दूसरों की है, तो सुधार की जरूरत क्या है? शिकायत हमें आत्म-मंथन और सुधार से रोकती है।
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शिकायत को समाधान मे बदलने के जरूरी कदम
शिकायत को पूरी तरह से खत्म करना असंभव है, पर उसे रचनात्मक ऊर्जा में बदला जा सकता है। इसे 'शिकायत का ट्रांसफॉर्मेशन फॉर्मूला' कह सकते हैं।
पहला कदम: शिकायत पकड़ो और पहचानो। जब भी मन मे शिकायत आए, उसे नजरअंदाज बिलकुल भी न करे। उस समय खुद से पूछिए की "मैं किस बात को लेकर इतना परेशान हूँ?" शिकायत को पहचानना पहला कदम है, उसे नकारना नहीं।
दूसरा कदम: दोष देने से पहले ज़िम्मेदारी खोजिए। हर बार गलती दूसरो की नहीं होती। हर शिकायत से पहले अपनेआप से एक सवाल जरूर पूछे कि " इस काम के गलत होने मे मेरी क्या भूमिका है?" उसमे शायद पूरी गलती आपकी न हो, पर थोड़ी गलती के ज़िम्मेदारी ज़रूर होंगे। बस उसी थोड़ी गलती को पहचान कर सुधार शुरू करना है।
तीसरा कदम: समस्या को शब्द दीजिए, बहाना नहीं। जिस समस्या को हम समझ सकते है उसकी का समाधान भी ढूंढ सकते है। कुछ लोग ऐसा बोलते है कि “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?” इस सवाल के शब्दों को बदल कर देखिये कि “मैं इसे कैसे बेहतर बना सकता हूँ?” जैसे ही आप ऐसा करोगे आप पाओगे की आपके दिल से बोझ हट गया और अब आप समस्या का समाधान ढूंढ़ने मे लगे हो।
छोटा कदम: जिस चीज़ पर नियंत्रण नहीं, उसे छोड़ दीजिए। जिस भी चीज़ को आप नियंत्रित नहीं कर सकते उसको छोड़ देना ही बेहतर होता है। जैसे मौसम, सरकार और दूसरे लोगो की सोच इनको हम कभी भी नियंत्रित नहीं कर सकते। बल्कि अपनी पूरी ऊर्जा वहाँ लगानी चाहिए जहाँ आपका पूरा नियंत्रण हो, जैसे आपकी मेहनत, आपकी तैयारी, और आपकी प्रतिक्रिया।
पाँचवा कदम: शिकायत को कार्य में बदलिए। जब भी कोई शिकायत करे उसको ऐसा काम करके दिखाना चाहिए की वो चाहकर भी नजरअंदाज न कर सके। अगर कभी हालात से शिकायत हो तो काम करके खुद को इतना मजबूत बना लेना चाहिए की हालत भी छोटे लगने लगे।
छठा कदम: कृतज्ञता (Gratitude) की आदत डालिए। किसी छोटी चीज़ के लिए भी आभारी होने से शिकायत करने की आदत धीरे-धीरे खतम हो जाती है। हमे ऐसे काम करने चाहिए की हम हररोज अपने लिए भगवान द्वारा दिए गए उपहारों के लिए आभारी हो। जब भी दिन खत्म हो अपनी डायरी मे तीन चीज़े ऐसी लिखिए जिनके लिए आप आभारी हो।
सातवां कदम: बोलने से पहले सोचिए। हर बात जो मन में आए, उसे बोल देना ज़रूरी नहीं होता। जिस तरह तराजू पर चीज़ो को तोला जाता है उसी तरह अपने शब्दों को भी तराजू पर तोल कर बोलना चाहिए। जो इंसान बातो को सोच-समझकर कर बोलता है लोग उसकी बातो को ज्यादा ध्यान से सुनते है और मानते है। जो लोग कुछ भी बोलते है लोग न उनकी बातो को ध्यान से सुनते और न उनको मानते है।
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निष्कर्ष
शिकायत करना अपने आप मे कोई बुरी बात नहीं है। असली समस्या तब शुरू होती है जब शिकायत करना हमारी आदत बन जाती है और उसका समाधान हमारी सोच से बाहर हो जाता है। शिकयत हमे कुछ पलों की रहत तो दे सकती है, पर लंबे समय मे यह हमे अंदर ही अंदर खत्म कर देती है। यह हमे इस बात का विश्वास दिला देती है की हमारी ज़िन्दगी की डोर हमारे हाथ में नहीं, बल्कि दूसरों, हालातों और किस्मत के हाथ में है।
जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है। जिस दिन हम यह समझ लेते हैं कि हर शिकायत के पीछे हमारी कोई न कोई ज़िम्मेदारी छुपी है, उसी दिन से बदलाव शुरू हो जाता है। शिकायत दरअसल एक संकेत है यह जताने का कि हमारी ज़िंदगी के किस हिस्से में सुधार की ज़रूरत है।
अगर हम शिकायत को दोष देने का हथियार नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण का साधन बना लें, तो वही शिकायत हमारे विकास की सबसे बड़ी गुरु बन सकती है।
एक बात याद रखिए कि "दुनिया बदलने से पहले अगर हम खुद को बदल लें, तो दुनिया अपने आप बदलने लगती है।" और जिस दिन हम शिकायत करना छोड़कर समाधान कि तरफ आगे बढ़ेंगे उसी दिन से हमारे जीवन मे सुधार शुरू हो जायेगा।
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Very positive post Sir ❤️❤️
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