"Why is comparison the greatest enemy of our happiness?"

सभी पाठको का मेरा दिल से नमस्कार

आप सभी के प्यार और सराहना के लिए दिल से शुक्रिया। रिश्तों को अच्छा और मजबूत बनाने के लिए समय लगता है, आप और मैं (हम) उसी रास्ते पर है। आज का जो विषय चर्चा के लिए लाया हूँ, वो बहुत ही दिलच्सप है। इस विषय के बारे मे सब लोग जानते है, क्यूंकि बचपन से ही हम इसका शिकार होते आ रहे है।

"तुलना" सब इस शब्द को अच्छे से जानते है। कभी न कभी आप भी इसका शिकार जरूर हुए होंगे, या हररोज इसका शिकार हो रहे हो। "तुलना" को खुशियों का दुश्मन भी समझा जाता है। क्यूंकि जो है "उस पर नहीं, जो नहीं है उस" पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जाता है। आज हम इसी पर चर्चा करेंगे की "तुलना किस तरह हमारी खुशियों का गला घोट देती है "।

आइये पहले देखते है, की सबसे ज्यादा तुलना कहाँ और किस वजह से होती है। सोशल मीडिया पर तुलना, पैसो के लिए तुलना, रिश्तेदारों से तुलना, शारीरक सुंदरता को लेकर तुलना, सफलता की तुलना,अच्छे  माता-पिता हों या नहीं की तुलना और जो अंत मे उम्र के हिसाब से तुलना। इन सभी तुलनाओं की वजह से बहुत लोग घुट-घुट कर जीते है, और कुछ लोग जो यह सह नहीं पाते वो आत्महत्या तक कर लेते है।

आजकल सोशल मीडिया का दौर है, सभी लोग इसका इस्तेमाल दिन मे कम से कम तीन से चार घंटे तो करते ही है। सोशल मीडिया पर लोग फोटोज और वीडियो डालते है, उनके जीने का तरीका की, उनके कपड़े, उनके फ़ोन, उनकी गाड़िया,जगह-जगह घूमने की। हम अपने ऑफिस मे काम करते हुए सोचते है की ये लोग बढ़िया है और मैं ऑफिस मे बैठकर बॉस की गालियाँ खा रहा हूँ।

आजकल लोगो ने पैसे को ही भगवान बना लिया है। उनको इंसानियत से कुछ लेना-देना नहीं बस पैसा मिलना चाहिए। जब भी आप किसी के साथ बैठे होते है, अपने परिवार मे या दोस्तों के साथ इस बारे मे चर्चा तो जरूर होती होगी की "कितना कमा लेते हो"? उसके बाद जिसकी जितनी कमाई, उसी हिसाब से उसकी इज़्ज़त।

एक इंसान ज़िन्दगी मे बहुत सारे रिश्ते बनाता है, कुछ से ख़ुशी पता है और कुछ से दुःख। बहुत ही कम रिश्ते होते है, जो सारी उम्र तक साथ चलते है। जब भी साथ बैठते है और बात करते है, रिश्तों की तब अक्सर लोग बताते है की उनका रिश्ता कितना अच्छा चल रहा है, और फिर हम सोचते है की हमारे रिश्तों मे बहुत दिक्कत है और कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा।

समाज मे शारीरिक सुंदरता को बहुत महत्व दिया जाता है। परन्तु आजकल सोशल मीडिया और सोशल स्टेटस की दौड़ मे यह एक नए मुकाम पर पंहुच गया है। लोग दुसरो के कद, रंग और शारीरिक बनवाट की वजह से उनसे रिश्ते भी नहीं रखते। लोग तो ताना भी मार देते है की दूर रह कभी  तेरा कला रंग मुझ पर भी ना चढ़ जाये।

आपने देखा ही होगा, जो लोग जीवन मे सफल होते है उनकी लोग इज़्ज़त बहुत ज्यादा करते है। लोग सफल लोगो कि संगत मे ही रहना पसंद करते है। उसके विपरीत जो लोग ज्यादा सफल नहीं होते, उनको समाज इज़्ज़त भी नहीं देता। उनको बस सुनाया जाता है कि तुम्हारे दोस्त सफल है और कमाते है और तुम खुद को देखो।

जब भी दो माता-पिता मिलते है, वो अपने बच्चो की बात जरूर करते है। शुरुवात ऐसे करते है की आपका बेटा/बेटी क्या करते है? जब बोल दे की अभी वो पढ़ रहा है, वो एक मुँह बनाते हुए बोलते है की अब तक पढ़ ही रहा है। हमारा बेटा/बेटी तो किसी बड़ी कंपनी मे जॉब करता है और महीने का बहुत कमाता है।

लोगो का दूसरों की उम्र से तुलना करना कभी ख़त्म नहीं होगा। जब भी कभी जॉब की बात हो, इतनी उम्र के हो गए अब तक जॉब नहीं लगी। जब रिश्ते की बात हो, इतनी उम्र के हो गए अब तक रिश्ता नहीं हुआ। जब पैसे की बात हो, इतनी उम्र के हो गयी अब तक कमाते नहीं हो। ऐसी बहुत सारी बाते उम्र की तुलना के बारे बोली जाती है।

इतनी सारी चीज़े है, जिसमे लोग दूसरों से तुलना करते है। जो लोगो के गले का फंदा बन जाता है, जो समय के साथ होले-होले कसता ही जाता है। जब इंसान को लगता है की वो और नहीं सह पायेगा वह आत्महत्या तक भी कर लेते है। इसलिए इस ब्लॉग को को बहुत ध्यान से पढ़े कि कैसे "तुलना कैसे खशियों का गला घोट रही है" 

1. हीन भावना पैदा करता है : कोई भी इंसान जब ऊर्जा से भरा होता है, वह दिल लगाकर काम करता है। परन्तु जब इंसान मे ऊर्जा ही ना रहे उसका किसी भी काम को करने का दिल ही नहीं करता। इस ऊर्जा के कम होने कि वजह है, जब उसमे हीन भावना आ जाती है। यह भावना इंसान के मनोबल भी तोड़ देती है।

हीन भावना तब आती है, जब हम दूसरों से अपनी तुलना करते है। तुलना करने पर देखते है उसके पास ऐसा कुछ है जो हमारे पास नहीं है। जैसे कि उसके पास एक बड़ी गाड़ी है, उसके पास अच्छी नौकरी है, उसकी शादी भी हो गयी, उसके पास अच्छा फ़ोन है और मैं पीछे रह गया। यह भावना इंसान को सोने नहीं देती और वह कहता है कुछ नहीं होगा अब और जो कर रहा होता है उसको भी करना छोड़ देता है।

2. आत्म-मूल्य (self-वर्थ) को कम करता है : जिस भी इंसान को अपना मूल्य पता होता है, वह उससे कम मे समझौता नहीं करता। इसके विपरीत उस इंसान के लिए तुलना और भी घातक हो जाती है जिस को अपना मूल्य ही ना पता हो। वह हर बार खुद के मूल्य को कम ही आंकेगा। इसी आंकलन की वजह से वह दुखी होता रहेगा।

जिस इंसान का मूल्य उसने खुद ही कम लगा लिया, आपको लगता है, को उसको ज्यादा मूल्य देगा?

वह जब भी खुद से ज्यादा सफल लोगो को देखता है और सोचता है कि वो इतने सफल कैसे है? क्या मे कम हूँ? उसके दिमाग मे सवाल उठते है कि क्या कमी है? जबकि कमी उसके आत्म-मूल्य की है। जब वह खुद का मूल्य पहचान लेगा वह भी सफल हो जायेगा।

3. ईर्ष्या और नकारात्मकता को बढ़ाता है : "तुलना" इंसान मे जलन को पैदा करती है, जिस वजह से रिश्ते और मानसिक शांति भी खराब होती है। जो भी आपके साथ रहता हो, उसको वो मिल जाए जो आप चाहते हो, उससे बहुत ईर्ष्या होने लगती है। जब ईर्ष्या होने लगती है, दिमाग मे उसके बारे मे नकारात्मकता भी बढ़ने लगती है। जो कल तक अच्छा दोस्त था आज वो दुश्मन बन गया।

अक्सर लोगो कोई कहते हुए तो सुना ही होगा की उसकी किस्मत अच्छी है और मेरी खराब है। उसको वो सब कुछ मिलता है जो मे चाहता हूँ। लोग परिवार मे एक दूसरे से तुलना करते है मुझे ये मिला तुझे क्या मिला? जिस वजह से भाई-भाई आपस मे ईर्ष्या रखते है और परिवार अलग हो जाते है।

4. छोटी-छोटी खुशियों को अनदेखा करना : जब भी किसी से "तुलना" करने लगते है, दूसरों के बड़े सुख देखकर,अपने छोटे-छोटे पलों को भूल जाते है।  उसके पास इतनी बड़ी गाड़ी है, उसके पास इतना महंगा फ़ोन है। मेरे पास ये टूटी हुई बाइक और सस्ता सा फ़ोन है। यह भूल जाते है जब जरूरत पड़ती है यह टूटी हुई बाइक ही काम आती है, किसी का हालचाल पूछने के लिए सस्ते फ़ोन से बात हो जाती है।

किसी ने बोला है की "दूसरों के महलो को देखकर खुद के कच्चे मकान नहीं तोडा करते।" कोई अपने घर मे राजा होगा, पर मेरे घर का राजा मैं हूँ। लोग बार-बार आएंगे और अपने को बड़ा बतायेगे पर जरूरी है खुश रहना, जो समय पास है उसको जी भर के जीना।

5. दूसरों की रेस में भागने की मजबूरी : जब भी किसी से "तुलना" करते है हम एक ऐसी गलती कर बैठते है, जिसका हमे बाद मे पता लगता है। दूसरों से तुलना के चक्कर मे हमने अपने लक्ष्य को भूलकर दूसरों को देखकर भागने लगते है। जो रेस हमारी कभी थी ही नहीं, हम ना चाहते हुए भी उस रेस का हिस्सा बन जाते है।

आजकल ज्यादातर लोग "एप्पल" के फ़ोन को खरीदना चाहते है। जिसको जरूरत नहीं भी है उसको भी एक लाख का फ़ोन चाहिए। बच्चे भूखे रहकर माता-पिता से ज़िद्द कर रहे है की एप्पल का फ़ोन ही चाहिए। आपका काम सस्ते फ़ोन से भी चल सकता है,पर नहीं एप्पल ही चाहिए। इससे आप उस रेस का हिस्सा बन गए और अब किश्तों पर लेना मज़बूरी बन गयी है  

दूसरों की रेस मे भागने की मज़बूरी मे हम कर्जा लेंगे, ताकि हम किसी से पीछे ना हो जाये। हमारी सैलरी से ज्यादा तो हम कर्जा ले लेंगे क्यूंकि हमे पीछे नहीं रहना है।  जब यह कर्जा बहुत बढ़ जायेगा हमे तनाव होना शुरू हो जायेगा।  एक रेस जो हमारी थी भी नहीं उसकी वजह से हम कर्जे और तनाव मे आ गए।

6. कभी न खत्म होने वाली भूख : जब भी किसी से "तुलना" होती है, हमे दूसरों से बेहतर चीज़ ही चाहिए  होती है। यह चाहत हमे लालची बना देती है, जो भी चाहिए सबसे बेहतर चाहिए। उसको पाने के लिए लोग किसी भी हद्द तक जाने के लिए लोग तैयार हो जाते है। यह चाहत कभी खत्म नहीं होगी, क्यूंकि नयी चीज़े आती रहेगी।

आजकल टेक्नोलॉजी का दौर है, हररोज नए-नए अविष्कार होते रहते है। किसी कंप्यूटर की नयी और बड़ी स्क्रीन आ गयी। जो फ़ोन पहले था उससे बेहतर फ़ोन आ गया, अब उसको खरीद लिया। अब कुछ दिन बाद उससे बेहतर आएगा और वो खरीदोगे, और परसो उससे बेहतर आएगा उसको खरीदोगे। आप ही खत्म हो जाओगे पर नया आना कभी खत्म नहीं होगा।

7. दूसरों की नज़र से खुद को देखना : जब भी किसी से "तुलना" करते है, तब खुद को दूसरों की नजरो से देखने लगते है। अगर मैं ऐसे कपडे पहनूँगा तब लोगो को मैं कैसा। लगूंगा। अगर मे यह फ़ोन खरीद लूंगा तब लोगो को कैसा लगूंगा। खुद की पसंद-नापसंद को भूलकर सिर्फ इस बात का ख्याल रखना की कैसा लगूंगा।

लोग इस बात को मानते नहीं है, पर वो ऐसे ही है। खुद को दूसरों को नजरो से देखते है, जो सही है वो ना करके वो करते है जो लोग देखना चाहते है। उनका पढ़ने का मन होता है, पर कभी दोस्त नाराज ना हो जाए खुद भी नहीं पढ़ते। कब तक खुद को दूसरों की नजरो से देखते रहोगे खुद को और खुद की ख़ुशी को देखना शुरू करो अगर खुश रहना है।

8. मानसिक बीमारियों को न्योता : जब भी किसी से "तुलना" लगातार होती रहती है, वह हमारे ऊपर मानसिक दबाव बनाती है। जिसकी वजह से हमारा दिमाग लगातार चलता रहता है, खुद को दूसरों से कम पता है। लम्बे समय तक तुलना मानसिक बीमारियों को जनम देती है, और इससे निकल पाना सबके लिए आसान नहीं होता। 

अगर कोई भी इंसान लम्बे समय तक दबाव मे रहता है, उससे उसकी मानसिक स्थिति पर बहुत फर्क पड़ता है। इस वजह से डिप्रेशन, एंग्जाइटी और लो सेल्फ-एस्टीम जैसी चीज़ो से गुजरना पड़ता है। तुलना एक हद तक ठीक पर उसके बाद वह मानसिक दबाव ही बढाती है।

तुलना एक "खुशी का खतरनाक शत्रु" है, जो हमें अपने आनंद और संतुष्टि से दूर कर देता है। यह हमें दूसरों के जीवन के "हाइलाइट्स" देखकर अपनी वास्तविकता को भूलने पर मजबूर करती है, जिससे हीन भावना, तनाव और असंतोष पैदा होता है।

अगर हम खुद की प्रगति पर ध्यान दें, कृतज्ञता का भाव रखें और दूसरों की सफलता से प्रेरणा लें, तो तुलना का जहर खत्म हो जाएगा। याद रखें:

"आपकी खुशी आपके अपने हाथों में हैइसे दूसरों से तुलना करके नष्ट मत होने दें।"

 तुलना छोड़ो, जीवन जियो!

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