Don't lose yourself just because you see others winning
“दूसरों को जीतते हुए देखकर खुद मत हार जाना”
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हम सब अपनी ज़िंदगी को एक दौड़ की तरह देखते है। जिसमे कुछ लोग हमसे आगे होते है, तो कभी हम किसी से आगे निकल जाते है। मगर सबसे ज्यादा दिक्कत तब आती है, जब हम दूसरों को सफल होता देखकर अपनी हिम्मत और हौसला खोने लगते है। यह ब्लॉग उन सभी लोगो के लिए है जो कभी-कभी ऐसा सोचते है कि "सब लोग मुझ से आगे निकल गए, और मैं आज भी यहीं खड़ा हूँ।"
आज का युग खुद को दूसरों से बेहतर दिखाने का युग है। स्कूल से लेकर कॉलेज तक, नौकरी से लेकर बिज़नेस, शादी से लेकर सामाजिक जीवन तक हम हर जगह दूसरों से अपनी तुलना करते है। परंतु सोशल मीडिया ने इस चीज़ को और ज्यादा बढ़ावा दे दिया है। हम हररोज दूसरों की छुट्टियों, नई नौकरियों, शादियों, खरीदारी और उपलब्धियों के बारे में देखते हैं, और अक्सर अपनी ज़िंदगी से नाखुश हो जाते हैं।
एक सच्चाई यह भी है की सोशल मीडिया पर जो चीज़ दिखाई देती है वह पूरी कहानी नहीं होती। लोग सोशल मीडिया पर अपने संघर्ष, असफलताएं और अपने दुःख सांझा नहीं करते। वे सिर्फ वही दिखाना पसंद करते है जो चमकदार और दिखने मे अच्छा लगे।
एक स्टडी से ये भी पता लगा है की जो लोग दिन मे दो घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते है, उनमें अवसाद (डिप्रेशन) और चिंता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यह आंकड़ा हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम असलियत और छवि के बीच का अंतर भूलते जा रहे है।
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कहानी: एक मिडिल-क्लास लड़के की
रोहित एक मिडिल- क्लास परिवार का लड़का था। उसने एक बड़े कॉलेज से इंजीनियरिंग खत्म करने के बाद एक छोटी-सी कंपनी मे नौकरी शुरू कर दी। उसके दोस्त अमन और साहिल उससे बड़ी कंपनी और ज्यादा सैलरी पर काम करने चले गए। रोहित को ऐसा लगा की वह उनसे पीछे रह गया है।
एक ऐसा दिन आया जिस दिन रोहित की कंपनी बंद हो गई। जबकि उसके सारे दोस्त जीवन मे सफलता की सीढिया चढ़ रहे थे, रोहित अब बेरोजगार हो गया। यह उसके जीवन मे ऐसा मोड़ था जिस दिन वह हार मान सकता था और साथ ही अपने दोस्तों को आगे बढ़ता देख रहा था। उसे खुद के लिए बहुत बुरा लग रहा था की वह अब पीछे रह गया।
रोहित के पास अब दो ही रास्ते थे पहला की वह निराश होकर बैठ जाता और दूसरा इस चुनौती को अवसर मे बदलता। उसने हिम्मत करके दूसरा रास्ता चुना। रोहित ने अपने छोटे से स्टार्टअप आइडिया को पूरा समय देना शुरू किया। शुरू के कुछ साल उसको कोई खास सफलता नहीं मिली। उसे पैसे की समस्या थी, ग्राहक नहीं मिल रहे थे, और उसके दिल मे कई बार इस आईडिया को छोड़ने का मन भी बना लिया था।
दूसरे साल रोहित के काम मे थोड़ी तेजी आई और बाजार मे उसका थोड़ा नाम हो गया। उसे धीरे-धीरे ग्राहक मिलने लगे। तीसरे साल उसकी कंपनी ने मुनाफा कमाना शुरू कर दिया। पाँचवे साल मे, उसकी छोटी कंपनी बड़ी हो गई थी।
आज रोहित एक बड़ा आदमी है। जब वह पीछे मुड़कर देखता है, तो उसे एहसास होता है कि अगर उसने उस समय हार मान ली होती जब उसके दोस्त आगे बढ़ रहे थे, तो वह कभी यहाँ नहीं पंहुच पता। रोहित की कहानी हमे सिखाती ही कि जीवन की दौड़ लंबी है, और शुरुआत में पीछे रह जाना अंत में जीतने से नहीं रोक सकता।
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दूसरों की सफलता से सीखें, निराश न हों
दूसरों की सफलता देखकर निराश होने के बजाय, हम सीख सकते है और हम अपने जीवन मे बदलाव कर सकते है। याद रखें:
हर किसी की यात्रा अलग होती है: हर किसी के लिए सफलता अलग होती है जैसे एक बीमार आदमी के लिए एक दिन निकालना सफलता होती है। हर किसी की सफल होने की उम्र भी अलग होती है, कोई बीस मे हो जाता है, कोई तीस मे तो कोई पचास में। मुकेश अंबानी ने 40 साल की उम्र के बाद रिलायंस को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। कर्नल सैंडर्स ने 65 साल की उम्र में KFC की शुरुआत की। वह 1009 असफलताओं के बाद सफल हुए थे।
सफलता की परिभाषा सबकी अलग होती है: हम जिस समाज मे रहते है, वहाँ सफलता की परिभाषा सबके लिए अलग होती है। सभी लोग अपने मूल्यों और लक्ष्यों के अनुसार सफलता को परिभाषित करते है। कुछ लोगो के लिए पैसा कामना सफलता है, किसी के लिए समाज मे बदलाव लाना सफलता है, किसी के लिए सरकारी नौकरी पाना सफलता है।
आपका एकमात्र मुकाबला अपने कल के खुद से है: अगर आप अपने जीवन मे कल से बेहतर कर रहे हो, तो आप सही दिशा मे बढ़ रहे हो। दूसरों से अपनी तुलना बंद कर दें। एक डायरी बनाए जिसमे खुद के पूछ कर लिखे कि क्या मैं पिछले हफ्ते से बेहतर काम कर रहा हूँ? क्या मैंने कुछ नया सीखा? क्या मैं अपने लक्ष्यों के करीब पंहुच रहा हूँ?
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असफलता: सफलता की सीढ़ी
असफलता को लोग अक्सर नकारात्मक रूप से देखते है, लेकिन असल मे यह सफलता की पहली सीढ़ी है। थॉमस एडिसन ने बल्ब का आविष्कार करने से पहले 1000 बार असफल हुआ था। जब एक पत्रकार के उनसे पूछा कि इतनी बार असफल होने पर कैसा लगता है? उन्होंने जवाब दिया कि "मैं 1000 बार असफल नहीं हुआ, बल्कि मैंने 1000 तरीके खोज लिए जिनसे बल्ब नहीं बनता।" यह बात सुनकर पत्रकार भी हैरान हो गया।
ऐसी और भी बहुत सारी घटनाएं है जिन्होंने ने असफलता हो अलग नजरिये से देखा और जीवन मे सफलता पाई। असफलता से डरने की बजाय, उसे स्वीकार करना सीखे। हर असफलता आपको कुछ सिखाती है, और आपको मजबूत बनाती है। जापान में एक दर्शन है: "किंत्सुगी" - जहाँ टूटे हुए बर्तनों को सोने से जोड़ा जाता है। इस दर्शन का सार है कि टूटना और फिर से जुड़ना आपकी कहानी का हिस्सा है, और यह आपको और सुंदर बनाता है।
कुछ उदहारण:
- एपीजे अब्दुल कलाम: वह एक गरीब परिवार मे पैदा हुआ और वे अख़बार बेचते थे। लेकिन उन्होंने अपने जीवन मे कभी हार नहीं मानी और भारत के मिसाइल मैन बने और देश के राष्ट्रपति भी बने।
- स्टीव जॉब्स: एक ऐसे आदमी जिनको उसी की कंपनी से निकल दिया गया था। लेकिन उन्होंने अपने जीवन मे कभी हार नहीं मानी और Apple को दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों मे से एक बनाया।
- माइकल जॉर्डन: एक ऐसे इंसान जिसका नाम स्कूल की बास्केटबॉल टीम से नाम काट दिया था। लेकिन उन्होंने कभी अपने जीवन मे हार नहीं मानी और दुनिया के महानतम बास्केटबाल खिलाड़ी बने।
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तुलना की मानसिकता से बाहर निकलने के व्यावहारिक तरीके
- सोशल मीडिया डिटॉक्स: आजकल सोशल मीडिया से कोई भी नहीं बच सकता। इसलिए हफ्ते मे एक दिन के लिए सोशल मीडिया से पूरी तरह से दूरी बना ले। इस समय को दूसरे कामो मे लगाए जैसे अपने शोक पुरे करना, घूमना, किताब पढ़ना या अपने परिवार के साथ समय बिताना।
- कृतज्ञता की डायरी: हर रात को सोने से पहले तीन चीजें लिखें जिनके लिए आप आभारी हैं। यह अभ्यास आपको उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा जो आपके पास हैं, न कि जो आपके पास नहीं है।
- सीमाएं तय करें: जब तक किसी काम को करने की तय सीमा नहीं है, तब तक उस पर ध्यान नहीं दिया जाता। जैसे ही समय नजदीक आने लगता है, दबाव बढ़ने लगता है। पर अगर समय रहते ही काम कर लिए जाता इतना दबाव नहीं होता।
- माइंडफुलनेस और मेडिटेशन: हर इंसान को प्रतिदिन 10 मिनट ध्यान करना चाहिए। यह एक अभ्यास आपको वर्तमान में जीना सिखाएगा और तुलना की प्रवृत्ति से मुक्त करेगा। जिससे जीवन मे आगे बढ़ने मे सहायता मिलेगी।
- दूसरों की सफलता का जश्न मनाएं: जो लोग दूसरों की खुशियों मे खुश होते है, उनको बधाइयाँ देते है। भगवान उनको और देते है और इस अभ्यास से जलन की भावना भी कम होती है।
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निष्कर्ष
ज़िंदगी उस दौड़ की तरह है जिसमे सिर्फ एक जीत नहीं हो सकती। यह एक लंबी मैराथन की तरह है जहाँ हर किसी का रास्ता, गति और मंजिल सब अलग है। दूसरे जीत रहे है, यह देखना अच्छा है, मगर इससे दुखी नहीं होना चाहिए।
एक बात याद रखे, बांस का पेड़ शुरुवात के पाँच साल तक जमीन के ऊपर ज्यादा नहीं बढ़ता, मगर उसकी जड़े गहरी और मजबूत हो रही होती है। पाँच साल पूरे होने के बाद वह इतनी तेजी से बढ़ता है और ऊँचा उठता है। आपके साथ भी ऐसा हो सकता है, आपकी जड़े मजबूत हो रही हो, और आपका समय बस आने वाला है।
दूसरों को जीतते हुए देखो, उनकी सहायता भी करो पर खुद मत हार जाना। हम सबकी यात्रा अलग है, सबकी लड़ाई अलग है और सबकी जीत का समय भी अलग आएगा। खुद पर विश्वास रखे, और अपने काम मे लगे रहे और चलते रहे। क्योंकि सबसे बड़ी हार तो प्रयास करना छोड़ देना है। जो अपने जीवन मे आगे बढ़ता रहता है, वो एक दिन जरूर जीतता है।
आपकी जीत का इंतज़ार आप ही कर रहा है। उस तक पहुँचने से पहले ही मत रुकिए।
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