No Civic Sense, No Common Sense Either
सिविक सेंस नहीं, कॉमन सेंस भी नहीं।
हम सभी ने अपने जीवन में यह अनुभव किया है। एक ट्रैफिक जाम में लम्बे टाइम तक फंसे रहते हैं, और बाद में पता चलता है कि इसकी वजह एक ड्राइवर था, जो अपनी कार को बीच सड़क पर खड़ा करके फ़ोन पर बात कर रहा था। यह भी हमने देखा है कि लोग साफ-सुथरे पार्क में जाते हैं, वहीं बैठकर खाते हैं और सारा कचरा वहीं छोड़ कर चले जाते हैं। वो इतनी भी जहमत नहीं उठाते कि पास के डस्टबिन में डाल दें। एक सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल करना जो ऐसा लगता है जैसे किसी बदबूदार कमरे में आ गए हों, लोग दीवारों पर ही पेशाब करके चले जाते हैं।जब भी ऐसा देखते हैं, हमारे दिल से कुछ अपशब्द निकलते हैं, जो बहुत गुस्से से दिल से निकलते हैं कि लोगों को थोड़ी भी तमीज नहीं है यानी "लोगों में सिविक सेंस ही नहीं है।"लेकिन अगर आप इस चीज़ को रुककर थोड़ा गौर से देखने की कोशिश करें, तब एहसास होता है कि जैसा हम देख रहे हैं ये उससे भी गहरा है। यह सिर्फ सिविक सेंस की कमी नहीं है, एक देश के नागरिक के रूप में हमारे कर्तव्यों की सीखी हुई समझ भी है। यह कॉमन सेंस — यह पूरी तरह से बुनियादी मूल्यों की विफलता है, जो ज़िन्दगी को सही रास्ते पर चलने के लिए जरूरी है बिना किसी गड़बड़ के।"सिविक सेंस नहीं, कॉमन सेंस भी नहीं।" यह आज के जीवन में जहाँ लोग इतना पढ़े-लिखे और समझदार हैं, देश के कई हिस्सों में इसकी भारी कमी दिखाई देती है।सिविक सेंस और कॉमन सेंस के बीच का बारीक अंतरइन दोनों शब्दों में फर्क समझना ज़रूरी है। क्योंकि जो इन बातों में फर्क कर पाता है, वह समाज को आगे बढ़ने में भी मदद करता है।सिविक सेंस यह कई सारे लोगों की एक साथ सामूहिक समझ है। इसमें यह जानना शामिल है कि सार्वजनिक संपत्ति हमारी संपत्ति है, कि सड़कें सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं बल्कि पैदल चलने वालों के लिए भी हैं, कि सार्वजनिक स्थान की सफाई का मतलब है सबके लिए बेहतर स्वास्थ्य। यह एक सामाजिक जिम्मेदारी है जिसे हम स्कूल में, परिवार में, और समाज से सीखते हैं। जो देश को आगे बढ़ाने के लिए बहुत जरूरी है।कॉमन सेंस एक इंसान की व्यक्तिगत और व्यावहारिक समझ है। यह वह समझ है जो बताती है कि अगर आप रास्ते के बीच में कार रोककर फ़ोन पर बात करेंगे, तो सड़क पर जाम लग जाएगा। यह वह बुनियादी समझ है जो आपको समझाती है कि जो फर्श फिसलने वाला है उस पर थूकने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, बल्कि इससे किसी के फिसलने और चोट खाने का खतरा ज्यादा है। यह एक आसान सवाल है, जो पूछना है:
जब सभी लोग रेड लाइट होने पर लाइन में खड़े होते हैं, तब एक व्यक्ति तेजी से आता है, रेड लाइट तोड़ता है और आगे बढ़ जाता है, तो यह सिविक सेंस की कमी है। लेकिन जब कोई व्यक्ति ट्रैफिक लाइट तोड़ता है बिना यह देखे कि दूसरी तरफ से एक ट्रक तेजी से आ रहा है, तो यह कॉमन सेंस की भी कमी है। पहला गलत है, परन्तु दूसरा खतरनाक और मूर्खतापूर्ण है।
दैनिक जीवन के कुछ उदाहरणजो हमें ऊपर फर्क देखा है सिविक सेंस और कॉमन सेंस का, उसको आप दैनिक जीवन में कर रहे कामों के उदाहरण से देखते हैं जहां यह दोहरी विफलता साफ दिखती है।कूड़ा फेंकना
एक कहानी: रोशनी का दिया और अंधेराएक गांव था, जो चारों तरफ से घने जंगलों से घिरा था। इस गाँव में रातें बहुत अंधेरी होती थीं। बिजली नहीं थी, और लोगों के पास तेल से जलने वाले दिए ही एकमात्र साधन थे। गांव के बीच में छोटा सा मंदिर था, जिसके सामने एक दिया हमेशा जलता रहता था। इस दिए की रोशनी इतनी थी कि उसकी रोशनी में मंदिर के आसपास का एक बड़ा इलाका रोशन कर देती थी, जिससे रात में गुजरने वाले राहगीरों को मदद मिलती थी।
एक दिन, एक नया परिवार गाँव में आकर रहने लगा। एक दिन उनके घर में रोशनी के लिए तेल खत्म हो गया, और सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं। परिवार के बुजुर्ग ने अपने बेटे से कहा, "बेटा, मंदिर वाला दिया तो जल रहा होगा। उससे थोड़ा सा तेल ले आओ। हम कल नया तेल खरीद कर डाल देंगे।"अपने बुजुर्ग की बात मानता हुआ लड़का मंदिर पहुंचा और देखता है कि दिया तो पूरा भरा हुआ है। उसने सोचा, "इतने सारे तेल से थोड़ा सा निकाल लेता हूँ। कोई फर्क नहीं पड़ेगा।" और उसने एक छोटी सी कटोरी में तेल ले लिया।अगले दिन, एक दूसरे परिवार ने यह देखा। उन्होंने भी यही सोचा कि अगर वो ले सकता है तो हम क्यों नहीं? हम भी कल नया तेल डाल देंगे। उन्होंने भी तेल ले लिया।फिर क्या था? देखते-देखते गाँव में ये चलन बन गया। हर कोई यही सोचने लगा कि मैं बस थोड़ा सा ले रहा हूँ। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कोई भी नया तेल डालने नहीं आया। सबने उस दिए से तेल सिर्फ लिया ही लिया।कुछ ही हफ्तों में, वह भरा हुआ दिया आधा खाली हो गया। उसकी रोशनी कमजोर पड़ने लगी। मंदिर का इलाका पहले जितना रोशन नहीं रहा। लोग फिर भी नहीं रुके और तेल लेते रहे।एक रात, आखिरकार, वह दिया बुझ गया।अब पूरा इलाका अंधेरे में डूब गया। उसी रात, एक बूढ़ा आदमी, जो रोजाना उस रास्ते से गुजरता था, अंधेरे में ठोकर खाकर गिर गया और उसकी टांग टूट गई। एक औरत, जो अपने बीमार बच्चे को डॉक्टर के पास ले जा रही थी, रास्ता भटक गई और जंगल में खो गई।अगली सुबह, मंदिर के पास सब लोग इकट्ठा हुए और शोर मचाने लगे। "यह दिया कैसे बुझ गया? यह तो पूरे गाँव की रोशनी थी। किसकी गलती है?" सभी लोग खड़े हुए चिल्ला रहे थे।तब गाँव के सबसे बुजुर्ग और समझदार व्यक्ति ने आवाज उठाई। वह चुपचाप मंदिर के सामने खड़ा हुआ और बोला, "किसी की गलती नहीं है।" यह हर उस व्यक्ति की गलती है जिसने यह सोचकर तेल लिया कि 'बस मेरे थोड़े से लेने से क्या फर्क पड़ेगा?' तुम सबने सिविक सेंस नहीं दिखाया, क्योंकि तुम्हें इस सार्वजनिक संपत्ति की कीमत का एहसास नहीं था। लेकिन तुमने कॉमन सेंस भी नहीं दिखाया, क्योंकि तुम यह साधारण सी बात नहीं समझ पाए कि अगर हर कोई थोड़ा-थोड़ा लेगा, तो एक दिन सब कुछ खत्म हो जाएगा। और आज वह दिन आ गया है।"
सीख क्या है?यह कहानी हमारे आसपास हर दिन हो रही है। हम सभी वही गाँव वाले हैं।हम सब "मैं" में इतना उलझ चुके हैं कि "हम" को भूल गए हैं। और यही "मैं" की छोटी मानसिकता हमारे सिविक सेंस और कॉमन सेंस दोनों को निगल जाती है।
तो हल क्या है? कहाँ से शुरुआत करें?यह समझना पड़ेगा कि इस समस्या का कोई एक जादुई इलाज नहीं है। लेकिन एक छोटी शुरुआत भी की जाए तो बदलाव आ सकता है।
निष्कर्षसिविक सेंस एक आदत है, और कॉमन सेंस एक मानसिकता। हमें दोनों को ही विकसित करने की जरूरत है। यह सिर्फ कानून और जुर्माने से नहीं, बल्कि शिक्षा, संवाद और सामूहिक जागरूकता से ही संभव हो सकती है।अगली बार जब भी कोई लिफाफा हाथ में लें, या ट्रैफिक लाइट पर खड़े हों, या सार्वजनिक नल का इस्तेमाल कर रहे हों, तो अपने आप से एक साधारण सा सवाल पूछें:
आप भी कमेंट करके बता सकते हैं कि आपने क्या-क्या अनुभव किया है। कब-कब आपको लगा कि लोगों में सिविक सेंस नहीं है।
"अगर हर कोई ऐसा ही करे, तो क्या होगा?"
जब सभी लोग रेड लाइट होने पर लाइन में खड़े होते हैं, तब एक व्यक्ति तेजी से आता है, रेड लाइट तोड़ता है और आगे बढ़ जाता है, तो यह सिविक सेंस की कमी है। लेकिन जब कोई व्यक्ति ट्रैफिक लाइट तोड़ता है बिना यह देखे कि दूसरी तरफ से एक ट्रक तेजी से आ रहा है, तो यह कॉमन सेंस की भी कमी है। पहला गलत है, परन्तु दूसरा खतरनाक और मूर्खतापूर्ण है।
दैनिक जीवन के कुछ उदाहरणजो हमें ऊपर फर्क देखा है सिविक सेंस और कॉमन सेंस का, उसको आप दैनिक जीवन में कर रहे कामों के उदाहरण से देखते हैं जहां यह दोहरी विफलता साफ दिखती है।कूड़ा फेंकना
- सिविक सेंस की कमी: जो जगह बनाई गई है कूड़ा डालने की, उसकी बजाय सार्वजनिक स्थान पर कूड़ा डालना और वहाँ कूड़े के पहाड़ बना देना। घर की साफ-सफाई की और सारा कूड़ा बाहर सड़क पर फेंक दिया।
- कॉमन सेंस की कमी: अपनी चलती गाड़ी की खिड़की से छिलके और रैपर फेंकना, यह सोचे बिना कि वह कूड़ा सड़क पर ही पड़ा रहेगा, पर्यावरण को प्रदूषित करेगा, और दूसरी गाड़ियों के लिए खतरा पैदा करेगा। या फिर, कूड़ेदान के ठीक बगल में जमीन पर कूड़ा फेंकना—वह पूरा एक कदम का फर्क जिसे तय करने में भी आलस्य महसूस होता है।
- सिविक सेंस की कमी: सड़कों पर जेब्रा क्रॉसिंग इसलिए बनाई जाती है, ताकि पैदल चलने वाले लोगों की तकलीफ न हो। पर लोग उस पर भी गाड़ी खड़ी कर देते हैं और पैदल चलने वालों को रास्ता भी नहीं मिलता।
- कॉमन सेंस की कमी: कुछ लोग आपने देखे होंगे जो गलत तरफ से आ रहे होते हैं, सिर्फ इसलिए कि यह एक शॉर्टकट है, और यह भी उम्मीद करना कि जो ट्रैफिक आ रहा है वो आपको रास्ता दे देगा। यह तरीका खुद के लिए और दूसरों के लिए आत्मघाती होता है।
- सिविक सेंस की कमी: लोग सार्वजनिक जगहों जैसे बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और भी कई ऐसी जगहों पर नल का इस्तेमाल करते हैं और उसको बिना बंद किये ही चले जाते हैं।
- कॉमन सेंस की कमी: लोग पाइप लगाकर सब्जियां या गाड़ी धोते हैं और नल को खुला छोड़ देते हैं और घंटों तक भूल जाते हैं, बिना यह सोचे कि पानी की बर्बादी हो रही है और गांव के दूसरे इलाकों में पानी की कमी हो सकती है।
- सिविक सेंस की कमी: जिस जगह पर लोग रहते हैं उस एरिया में रात को जोर-जोर से म्यूजिक बजाना और लोगों को बेवजह तंग करना।
- कॉमन सेंस की कमी: यह तो सबने ही देखा होगा कि लोग सार्वजनिक बस या मेट्रो में लाउडस्पीकर पर वीडियो देखते हैं, बिना यह महसूस किये कि आस-पास के दस और लोगों की शांति और निजता का उल्लंघन कर रहे हैं।
एक कहानी: रोशनी का दिया और अंधेराएक गांव था, जो चारों तरफ से घने जंगलों से घिरा था। इस गाँव में रातें बहुत अंधेरी होती थीं। बिजली नहीं थी, और लोगों के पास तेल से जलने वाले दिए ही एकमात्र साधन थे। गांव के बीच में छोटा सा मंदिर था, जिसके सामने एक दिया हमेशा जलता रहता था। इस दिए की रोशनी इतनी थी कि उसकी रोशनी में मंदिर के आसपास का एक बड़ा इलाका रोशन कर देती थी, जिससे रात में गुजरने वाले राहगीरों को मदद मिलती थी।
एक दिन, एक नया परिवार गाँव में आकर रहने लगा। एक दिन उनके घर में रोशनी के लिए तेल खत्म हो गया, और सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं। परिवार के बुजुर्ग ने अपने बेटे से कहा, "बेटा, मंदिर वाला दिया तो जल रहा होगा। उससे थोड़ा सा तेल ले आओ। हम कल नया तेल खरीद कर डाल देंगे।"अपने बुजुर्ग की बात मानता हुआ लड़का मंदिर पहुंचा और देखता है कि दिया तो पूरा भरा हुआ है। उसने सोचा, "इतने सारे तेल से थोड़ा सा निकाल लेता हूँ। कोई फर्क नहीं पड़ेगा।" और उसने एक छोटी सी कटोरी में तेल ले लिया।अगले दिन, एक दूसरे परिवार ने यह देखा। उन्होंने भी यही सोचा कि अगर वो ले सकता है तो हम क्यों नहीं? हम भी कल नया तेल डाल देंगे। उन्होंने भी तेल ले लिया।फिर क्या था? देखते-देखते गाँव में ये चलन बन गया। हर कोई यही सोचने लगा कि मैं बस थोड़ा सा ले रहा हूँ। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कोई भी नया तेल डालने नहीं आया। सबने उस दिए से तेल सिर्फ लिया ही लिया।कुछ ही हफ्तों में, वह भरा हुआ दिया आधा खाली हो गया। उसकी रोशनी कमजोर पड़ने लगी। मंदिर का इलाका पहले जितना रोशन नहीं रहा। लोग फिर भी नहीं रुके और तेल लेते रहे।एक रात, आखिरकार, वह दिया बुझ गया।अब पूरा इलाका अंधेरे में डूब गया। उसी रात, एक बूढ़ा आदमी, जो रोजाना उस रास्ते से गुजरता था, अंधेरे में ठोकर खाकर गिर गया और उसकी टांग टूट गई। एक औरत, जो अपने बीमार बच्चे को डॉक्टर के पास ले जा रही थी, रास्ता भटक गई और जंगल में खो गई।अगली सुबह, मंदिर के पास सब लोग इकट्ठा हुए और शोर मचाने लगे। "यह दिया कैसे बुझ गया? यह तो पूरे गाँव की रोशनी थी। किसकी गलती है?" सभी लोग खड़े हुए चिल्ला रहे थे।तब गाँव के सबसे बुजुर्ग और समझदार व्यक्ति ने आवाज उठाई। वह चुपचाप मंदिर के सामने खड़ा हुआ और बोला, "किसी की गलती नहीं है।" यह हर उस व्यक्ति की गलती है जिसने यह सोचकर तेल लिया कि 'बस मेरे थोड़े से लेने से क्या फर्क पड़ेगा?' तुम सबने सिविक सेंस नहीं दिखाया, क्योंकि तुम्हें इस सार्वजनिक संपत्ति की कीमत का एहसास नहीं था। लेकिन तुमने कॉमन सेंस भी नहीं दिखाया, क्योंकि तुम यह साधारण सी बात नहीं समझ पाए कि अगर हर कोई थोड़ा-थोड़ा लेगा, तो एक दिन सब कुछ खत्म हो जाएगा। और आज वह दिन आ गया है।"
सीख क्या है?यह कहानी हमारे आसपास हर दिन हो रही है। हम सभी वही गाँव वाले हैं।
- जब हम सार्वजनिक नल खुला छोड़ देते हैं, तो हम सोचते हैं, "बस मेरे एक नल से क्या फर्क पड़ेगा?" लेकिन अगर हजारों लोग ऐसा सोचें, तो पूरा शहर प्यासा रह जाएगा।
- जब हम सड़क पर कूड़ा फेंकते हैं, तो हम सोचते हैं, "बस मेरा एक रैपर से क्या फर्क पड़ेगा?" लेकिन अगर लाखों लोग ऐसा सोचें, तो शहर कूड़े के ढेर में बदल जाएगा।
- जब हम ट्रैफिक में शॉर्टकट लेते हुए गलत साइड से गाड़ी चलाते हैं, तो हम सोचते हैं, "बस मैं ही तो हूं, जाम नहीं लगेगा।" लेकिन अगर दस और लोग ऐसा सोचें, तो पूरा चौराहा जाम हो जाएगा।
तो हल क्या है? कहाँ से शुरुआत करें?यह समझना पड़ेगा कि इस समस्या का कोई एक जादुई इलाज नहीं है। लेकिन एक छोटी शुरुआत भी की जाए तो बदलाव आ सकता है।
- स्वयं से शुरुआत करें: किसी और को कहने से पहले खुद से शुरुआत करनी पड़ेगी। खुद से वादा करें। आज से, आप खुद को अपने किये कामों के लिए जवाबदेह ठहराएंगे। चाहे कोई देख रहा हो या नहीं, आप सही काम करेंगे। कूड़ा कूड़ेदान में ही डालेंगे, ट्रैफिक नियमों का पालन करेंगे, पानी बर्बाद नहीं करेंगे।
- बच्चों को सिखाएं: बच्चे ही देश का भविष्य हैं, जो आगे चलकर देश को संभालेंगे। अपने बच्चों में यह समझ डालें। उन्हें सिर्फ यह न बताएं कि "ऐसा मत करो," बल्कि यह भी समझाएं कि "ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए।" उन्हें वह "कॉमन सेंस" का तर्क दें। कहें, "अगर तुम यहां कूड़ा फेंकोगे, तो यह जगह गंदी हो जाएगी, और तुम्हें भी अच्छा नहीं लगेगा।" और आस-पास घर में बीमारियाँ फ़ैल जाएंगी।
- दूसरों को टोकें, लेकिन विनम्रता से: जब भी अपने आस-पास किसी को गलत करता हुआ देखें, तो विनम्रता से उसे समझाएं। गुस्से में भला-बुरा कहने के बजाय, उसके कॉमन सेंस से अपील करें। कहें, "भाई साहब, अगर आपने गाड़ी यहां खड़ी की, तो सबके लिए दिक्कत होगी, आपकी अपनी गाड़ी को भी नुकसान पहुंच सकता है।" यह "हम" की भावना पैदा करता है।
- "अपनापन" विकसित करें: जब तक हम सार्वजनिक संपत्ति को "सरकार की संपत्ति" या "किसी और की चीज" समझते रहेंगे, तब तक हम इसकी देखभाल नहीं करेंगे। हमें इसे "अपना" समझना होगा। यह पार्क हमारा पार्क है, यह सड़क हमारी सड़क है, यह देश हमारा देश है। क्योंकि यह सब हमारे ही पैसे से बना है, और अगर इसको नुकसान हुआ, भरना भी हमें ही पड़ेगा।
निष्कर्षसिविक सेंस एक आदत है, और कॉमन सेंस एक मानसिकता। हमें दोनों को ही विकसित करने की जरूरत है। यह सिर्फ कानून और जुर्माने से नहीं, बल्कि शिक्षा, संवाद और सामूहिक जागरूकता से ही संभव हो सकती है।अगली बार जब भी कोई लिफाफा हाथ में लें, या ट्रैफिक लाइट पर खड़े हों, या सार्वजनिक नल का इस्तेमाल कर रहे हों, तो अपने आप से एक साधारण सा सवाल पूछें:
"अगर हर कोई ऐसा ही करे, तो क्या होगा?"
इस एक सवाल में ही सिविक सेंस और कॉमन सेंस दोनों छिपे हैं। यह सवाल हमें हमारे व्यक्तिगत कर्मों के सामूहिक परिणामों से रूबरू कराता है।आइए, हम सब उस गाँव के लोग न बनें जिन्होंने अपनी ही रोशनी खुद ही बुझा दी। आइए, हम उस बुजुर्ग की बात समझें और एक ऐसे समाज का निर्माण शुरू करें जहां न सिर्फ सिविक सेंस हो, बल्कि कॉमन सेंस भी हो। क्योंकि एक बेहतर कल की शुरुआत, हमारे आज के एक छोटे से सही फैसले से ही होती है।आप भी कमेंट करके बता सकते हैं कि आपने क्या-क्या अनुभव किया है। कब-कब आपको लगा कि लोगों में सिविक सेंस नहीं है।
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