Why do people run away from positivity?
इंसान कि सोच ही उसका जीवन तय करती है, और हम सब इस बात से वाकिफ है कि हमारी सोच का कितना असर हमारी ज़िन्दगी पर पड़ता है। हम सब अपने जीवन मे लाखो नहीं करोड़ो बाते सोचते है, कुछ नेगेटिव और कुछ पॉजिटिव। अपनी सोच के मुताबिक हर इंसान अपनी ज़िन्दगी मे नतीजे पाते है।
अगर वह पॉजिटिव सोच रखता है, उसे समय लग सकता है, पर वह अपनी ज़िन्दगी मे सफल जरूर होगा। उसके विपरीत जो नेगेटिव सोच रखने वाला इंसान होगा, सफलता अगर उसके पास से भी जा रही होगी तो वह उसको और दूर कर देगा। सभी लोग पॉजिटिव लोगो के साथ ज्यादा समय बिताना पसंद करते हैं, और नेगेटिव लोगो से दूर रहते है।
हम सब अपनी ज़िन्दगी मे पॉजिटिव रहना चाहते है, पर मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक कारकों के जटिल अंतर्संबंध के कारण लोग "सकारात्मकता से दूर भागते हैं"। आज इस ब्लॉग मे हम इन्ही सब बातो के बारे मे चर्चा करेंगे कि क्यों हम ऐसा कर रहे है।
1. आलोचना का डर : यह वह लोग होते है, जिनको बहुत ज्यादा फर्क पड़ता है, कि दूसरे उनके बारे मे क्या सोचते है। वह इस बात का ख्याल रखते है कि लोग उनके बारे मे हमेशा अच्छी बाते ही बोले। वह कोई भी बात बोलने से बचते है, उनका दिल चाहे बार-बार बोलता रहे कि लोग गलत रास्ते पर जा रहे है। परन्तु वह फिर भी लोगो लोगो का नुकसान होता देखता है।
इसमें गलती उसकी भी नहीं है, जब भी वह पॉजिटिव होकर किसी मीटिंग मे बोला होगा तब लोगो ने उसका बहुत मजाक बनाया होगा। जिस वजह से उसके दिल मे डर बैठ गया है, कि अगर मैं आज अच्छा नहीं बोल पाया तब लोग फिर मेरा मजाक बनाएंगे। जिस वजह से वह उनका भला चाहता भी, उनकी सहायता नहीं कर पाता।
2. खुद को कम आंकना : बहुत सारे लोग अपने आप को हमेशा दुसरो से कम आंकते है, जिस वजह से वो लोग अपने जीवन मे पॉजिटिव बदलाव नहीं ला सकते। किसी भी काम को शुरू करने से पहले ही सोचने लगते है कि मुझ से नहीं होगा, मै इस काम के काबिल नहीं हूँ।
ऐसी चीज़ो मे इंसान के बचपन के अनुभवों और समाज द्वारा किये गए कामो का बहुत बड़ा हिस्सा रहता है। उनको लगता है कि उनके साथ कुछ भी अच्छा नहीं होगा वो कुछ भी करेंगे गलत ही होगा। इस वजह से लोग ज़िंदगी मे पॉजिटिव बदलाव नहीं कर पाते।
3. नेगेटिविटी से मज़ा आना : यह एक बड़ी वजह है, जिसकी वजह से लोग पाजिटिविटी से दूर भागने लग गए है। उन्हें नेगेटिव चीज़ो और बातो मे मज़ा आने लग गया है, क्यूंकि इसके बारे मे वो पहले से ही हर संभावित को सोच लेते है और खुद को सुरक्षित महसूस करते है।
अगर नेगेटिव चीज़ो को देखे जैसे कि खुद पर संदेह, विषाक्त संबंध, या विनाशकारी आदतें। इन्ही सब चीज़ो मे लोग लिप्त है। खुद को कम समझकर काम न करना, ऐसे रिश्तो मे होना जहां उनकी जरूरत नहीं कोई इज़्ज़त नहीं और बुरी आदतों मे सबको ही मज़ा आता है।
4. नुकसान या निराशा का डर : हम सभी नुकसान या किसी भी काम के पूरा ना होने पर जो निराशा होती है उससे डरते है। यह डर किसी चीज़ या व्यक्ति के खो जाने का या उमीदो को पूरा ना कर पाने की सोच से पैदा होता है। यह डर इंसान को अवसरों के लिए तैयारी और जोखिम लेने से रोकता है।
इस डर की वजह से हमारे रिश्तो और करियर पर बहुत असर पड़ता है। हम किसी को दर्द ना पंहुचा दे, किसी का दिल ना दुख दे इस वजह से बहुत बाते दिल मे ही रख लेते है। अगर हमे मन चाहये नतीजा मिलेगा या नहीं इस वजह से हम वो काम करते ही नहीं।
5. नेगेटिव सोचने की आदत : सुबह से शाम तक नेगेटिव सोचने की वजह से दिमाग मे एक पैटर्न बन गया है जो समय के साथ पक्का हो गया है। इसी एक वजह के कारण हम खुद पर संदेह करना और निराश रहना शुरू कर दिया है। हम समस्या के समाधान सोचने की बजाय हम आलोचना और नेगेटिव बाते ही सोचते और बोलते है।
नेगेटिव सोच की आदत के कारण लोग साथ भी खड़ा होना पसंद नहीं करते। जिसकी वजह से रिश्तों पर भी बहुत असर पड़ता है और अच्छे रिश्ते भी खराब हो जाते है।
6. सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव : इंसान की सांस्कृतिक और उसके समाज का उसके विश्वास और मूल्यों और परंपराओं का बहुत असर पड़ता है। एक ही सांस्कृतिक मे अलग समूह के अलग रीती-रिवाज़, भाषा और अलग आस्था हो सकती है।
जिस सामाज मे रहता है, उसके तौर तरीके भी वैसे ही हो जाते है, लोगो को किस नजर से देखता है, उनके साथ बातचीत कैसे करता है, और अपने निर्णय कैसे लेता है। ये सब वह अपने परिवार, शिक्षा, धार्मिक करम-कांड से सीखता है।
पाजिटिविटी से बचकर लोग सुरक्षित तो महसूस कर सकते है, लेकिन हमेशा असंतोष का जीवन ही व्यतीतत करेंगे। इसके लिए धैर्य, खुद के लिए और दुसरो से प्यार और भरोसे को दुबारा से बनाने की जरूरत है। इन सभी बातो को समझकर हम अपने जीवन मे पाजिटिविटी को एक दैनिक हिस्सा बनाकर शुरवात कर सकते है।
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