डर और डर के प्रकार
हम सब लोग अपने दैनिक जीवन मे हम बहुत सारी भावनावो को अनुभव करते हैं, कुछ अच्छी होती हैं और कुछ बहुत ही बुरी। हम अपनी भवनाओ से बचकर ना तो भाग सकते हैं और ना ही इनको किसी से छिपा सकते। इन सब भावनाओ से कोई भी बच नहीं सकता फिर वो चाहे बच्चा हो, बूढ़ा हो या फिर जवान। ये भावनाए अक्सर किसी के चहेरे से किसी की शारीरिक गतिविधिओ से पता लग ही जाती है, की वो इंसान कैसा अनुभव कर रहा है।
आज हम इस ब्लॉग मे जिस भावना की बात करेंगे, वो है डर। जिससे कोई भी इंसान अनजान नहीं है, जो हम सबको लगता है किसी को ज्यादा और किसी को कम। पर यदि कोई इंसान ऐसा बोले की उसने कभी डर को महसूस ही नहीं किया, वो यक़ीनन झूठ बोल रहा है। हमारे दिन की शुरवात ही डर से होती है, आज ऑफिस लेट तो नहीं हो जाऊंगा? आज बॉस का मूड कैसा होगा? आज दिहाड़ी मिलेगी? वो आज मुझे छोड़ तो नहीं देगी? और कहीं मेरी ज़िन्दगी का आज आखरी दिन तो नहीं? और भी ऐसे बहुत सारे डर है, जो हम अनुभव करते है।
ये जो डर वाली भावना है, ये हमारे शरीर के लिए एक अलार्म का काम करती है। जब भी हमे खतरा महसूस होता है, तभी हमारा दिमाग शरीर को सन्देश भेजने लगता है। कुछ गड़बड़ होने वाली है, या कुछ गड़बड़ हो चुकी है अब खुद को बचाओ। दिमाग कहता है, खुद को बचाओ और भाग जाओ। कभी-कभी ऐसी स्तिथि भी बन जाती है, जब दिमाग ही काम करना बंद कर देता है और ऐसा लगता है की शरीर को लकवा मार गया हो।
डर के भी कई प्रकार का होते है। जिनके बारे मे आप इस ब्लॉग मे पढ़ेंगे, और आशा करता हूँ की आपको भी जिस बात का डर होगा, वो आप कमेंट सेक्शन मे जरूर लिखेंगे।
1. जन्मजात डर: ये वो डर है जो, जिसके साथ ही हम सभी पैदा होते है, जो हमे ना सिखने की और ना ही अनुभव करने की जरूरत होती है। जो हज़ारो सालो के मानव जीवन के विकास के परिणामस्वरूप हमारे दिमाग मे बैठ चुके है। जानवर भी इसी डर के साथ ही जनम लेते है, ताकि वो खुद को शिकारियों से बचा सके। अगर हम उदहारण की बात करे उनमे से कुछ है तेज आवाज़ से डरना, अचानक कोई हरकत होना, उंचाइओ से डर और शिकारियों से डर। जन्मजात डर हमारे दिमाग की प्राचीन "अलार्म प्रणाली" हैं जो हमे नुकसान से सुरक्षित रखती हैं!
2.सीखा हुआ डर: हम लोग हर दिन अपनी ज़िन्दगी मे कुछ न कुछ नया सीखते रहते है। जिनका असर हमारे दिमाग मे बहुत लम्बे समय तक रहता है। इसी सीखने के दौरान हम बहुत सारी ऐसी चीज़ो का अनुभव भी कर लेते है जिनसे हमे डर लगने लगता है। जैसे बचपन मे किसी दोस्त को बन्दर ने काट लिया हो, हमे भी बन्दर से डर लगने लग जाता है।
ये सब देखकर हमारा दिमाग हमारी रक्षा के लिए खुद को ढाल लेता है। इन सब डर की वजह से हम उन कामो से खुद को दूर करने लगते है। अगर कोई हमारे सामने ऐसी बात भी करता है, उसे हम अपना दुश्मन समझने लगते है।
3. सामाजिक डर: हम सब लोग एक समाज मे रहते है। जहाँ कुछ लोग हमारी तारीफ और कुछ लोग हमारी आलोचना करते है। तारीफ को हम खुश होकर सुन लेते है, पर आलोचना से सबको बहुत डर लगता है। इन्ही डर की वजह से लोग हमेशा डर मे ही जीते है, और अपने डर से बाहर नहीं निकल पाते। जैसे नए लोगो से मिलना और बात करना। वे डरते है, की कही उन्हें शर्मिंदा ना होना पड़े, अपनी कही हुई बात के लिए। वे डरते है, की लोग उनकी बात से सहमत नहीं हुए ? लोग बाहर का समझकर उनसे अलग वयहवार करेंगे।
आजकल सोशल मीडिया के दौर मे उन डरो का भी अनुभव करने लग गए है, जिनके बारे मे कभी सुना भी नहीं था। इन डर की वजह से लोगो को दिमागी बीमारी भी होने लग गयी है, जिनसे निकला उनके लिए एक महाभारत हो गयी है। किसी को अच्छा खेलते देखकर हम भी सोचने लगते है की क्या हम भी इतना अच्छा खेल पाएंगे या नहीं? किसी की अच्छी नौकरी लगने पर हम भी सोच मे पड जाते है, की क्या हमारी भी इतनी अच्छी नौकरी लगेगी या नहीं?
4.अस्तित्व संबंधी भय: ये डर हमे हर रोज बहुत परेशान करता है, की हमारे जीवन का क्या उद्देश्य है? यह डर बाकि डरो से अलग है, क्यूंकि ये आज के खतरे का नहीं आने वाले कल के खतरे के लिए है। आज हम जो काम कर रहे है, क्या कोई कल हमे इन कामो के लिए याद भी रखेगा? मेरी लिखी हुई कहानियो को पढ़ेगा? अगर आज मुझे कुछ हो गया, क्या तब भी लोग मुझे याद रखेंगे या लोग मुझे भूल जाएंगे।
5. चिंता विकार: ये वो डर है, जो लम्बे समय तक चिंता या डर मे रहने की वजह से होते है। इस डर मे खुद की सोच को काबू करना बहुत मुश्किल हो जाता है, क्यूंकि कुछ भी चीज़ दिमाग मे साफ नहीं दिखाई देती। जैसे की आज क्या होगा? लोग मेरे काम को पसंद करेंगे? वो मुझे धोखा तो नहीं देगा या देगी? मै पढ़ तो रहा हूँ, क्या मेरा रिजल्ट अच्छा आएगा या नहीं? कोई मेरे बारे मे क्या सोच रहे है? मेरे पास पैसे नहीं है क्या करू? और भी बहुत सारी बाते जो हम सोचते है जिनकी वजह से हमारी चिंताए और बढ़ जाती है।
6. असफलता का डर: यह डर भी जब पैदा होता है, जब हमे लगता है हम अपनी ज़िदगी मे सफल नहीं हो पाएंगे। जो हमने खुद के लिए और अपने परिवार के लिए सपने देखे है, वो पूरा नहीं कर पाएंगे। जो काम किया है, वो बॉस को पसंद नहीं आया वो नौकरी से निकाल देगा? डर की एक बड़ी वजह हमारी पिछली असफलता भी रहती है, जो हर समय दिमाग मे चलती है की पहले ऐसे हुआ था। जब इंसान पर ये समय आता है, वो अपनी क्षमताओं पर भी संदेह करने लगता है।
7. नुकसान का डर: इस डर से हम सब मे से कोई भी अछूता नहीं है। जो खुद का व्यवसाय करते है, उनको नुकसान का डर, जो परिवार मे रहता है, रिश्तो का डर, जिसके पास बहुत संपत्ति हो, उसे उसको खोने का डर बना रहता है। नौकरी के चले जाने का डर, पैसो के लिए डर। जब इंसान सोचता है , पिछले नुकसान तब वह भविष्य के नुकसान की भी कल्पना करने लागत है। जबकि आपके पास जो कुछ भी है उसका मूल्य समझना जरुरी है, नुकसान का अत्यधिक डर खुशी को खत्म कर सकता है
8. परिवर्तन का डर: ये वो डर है, जिससे हम सब डरते है वजह हम बदलना नहीं चाहते। अगर को छोटी चीज़ भी अगर बदल जाए हम परेशान होने लगते है, और हम खुद की ज़िन्दगी बदलने की बात करते है। हम सब चाहते है की हमारा शरीर स्वस्थ रहे, पर अपने जीवन मे एक्सरसाइज करने को त्यार नहीं। अफसर बनना चाहते है, पर पढ़ने को तैयार नहीं। लेखक बनना चाहते है, पर लिखने को त्यार नहीं। कुछ लोग बहुत बुरी स्थिति मे गुजारा कर लेंगे पर खुद को बदलेंगे नहीं।
9. साथ का डर: यह वो डर है, जिसमे इंसान दूसरों के साथ भावनात्मक या शारीरिक निकटता का डर है। इसकी वजह अतीत मे रिश्तो हुई लड़ाईया, और जो दुःख हुआ साथ मे जो थे उनके चले जाने का। ऐसी स्थिति मे लोग गहरे रिश्ते बनाने से बचते है। उनको दूसरों से अपनी भावनाओं को साझा करने मे बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ये लोग अक्सर दूसरों से अलग ही रहना पसंद करते है।
10. दर्द का डर: यह डर, उन डरो से जुड़ा है जब हमे मानसिक या शारीरिक चोट लगी थी। उन पुराणी चोटो की वजह से हमारे मन मे डर या चिंता बन गयी है। जैसे किसी जलती हुई लकड़ी को हाथ मे उठा लेने पर जलन होती है, अगर कोई लकड़ी जला रहा हो हमे भी उस जलन का अनुभव होने लगता है। अगर हमारा एक्सीडेंट हो जाए, अगर कोई तेज बाइक स्वर गिर जाये हमे भी पता है उसको बहुत दर्द हुआ होगा।
Comments
Post a Comment
If you are trouble, let me know so we can discuss it.