“जीवन और हमारी सोच”

 “जीवन और हमारी सोच”

भगवान ने जीवन जीने के लिए दिया है,

बैठ कर सोचने के लिए नहीं।

सचिन कानिया


धरती ही एक मात्र ऐसा गृह है, जिस पर जीवन है. धरती पर जीवन होने की एक बहुत बड़ी वजह पानी है. वैज्ञानिकों ने धरती पर जीवन को दो भागो मे बाँटा है, एक वह जो साँस ले सकते है और दूसरे जो नहीं ले सकते। 

जो साँस ले सकते है उनको संजीव बोला जाता और जो साँस नहीं ले सकते उनको निर्जीव बोला जाता है. संजीव और  निर्जीव चीज़े मिलकर धरती को इतना खूबसूरत बनाते है.

“जीवन और हमारी सोच”

इस धरती पर कोई भी चीज़ थोड़े समय के लिए ही  रह सकती है, वो चाहे जीवित हो या मृत. उस थोड़े समय मे  भी वह हर समय बदलती रहती है और कभी एक जैसी नहीं रहती। समय के साथ-साथ इंसान को चलते रहना चाहिए क्यूंकि यह किसी के लिए नहीं रुकता। जो लोग समय से पीछे रह जाते है, वह उनको लेने पीछे नहीं आता बल्कि आगे ही आगे चलता रहता है.


इंसान जानवरो से अलग है, क्यूंकि जानवरो को सिर्फ खाने की तलाश करनी है और शिकारियों से अपनी जान बचानी है. जबकि एक इंसान की ज़िन्दगी उससे बहुत अलग है, क्यूंकि इंसानो को अपनी जान बचाने के अलावा भी बहुत साडी चीज़े करनी पड़ती है. एक इंसान को अपनी और अपने परिवार की सब जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करना पड़ता है. 


“जीवन और हमारी सोच”

एक इंसान अपना काम कैसे कर रहा है इसी से बहुत कुछ पता लगता है, की वह अपने काम से खुश है या मजबूरी मे कर रहा है. इसमें से जो भी अपना काम ख़ुशी से कर रहा है, चाहे वह काम भी कमा रहा होगा एक दिन वह तरक्की जरूर करेगा। जो काम मज़बूरी से कर रहा है, वह चाहे ज्यादा भी कमा रहा हो, उसकी तरक्की किसी काम की नहीं। 


एक बात बताता हूँ, एक समय की बात है, एक गाँव था वह सब लोग मिल-जूल कर रहते थे. उस गाँव  मे एक भी मंदिर नहीं था. सब गाँव वालो ने मिल कर पैसा जोड़ा ताकि वह गाँव मे भगवान का एक मंदिर बनवा सके. सब लोगो ने पोसे जोड़े और मंदिर बनाने का काम शुरू हो गया. उस गाँव के लोग बहुत खुश हुए और नाच-गाने के साथ रात गुजार दी.


एक साधु उस गाँव से गुजर रहे थे, उन्होंने देखा के लोग पत्थर तोड़ रहे है. वह साधु एक के पास पँहुचा और एक पत्थर तोड़ने वाले से पूछा की आप यह पत्थर क्यों तोड़ रहे हो? वह पहले से ही धुप से परेशान था और जवाब दिया की मेरी मत मरी गयी थी जो ये काम शुरू किया। साधु ने अंदाज़ा लगा लिया की यह काम को नहीं करना चाहता मज़बूरी से कर रहा है.


वह साधु दूसरे के पास गया गया और उससे भी प्रश्न किया की आप पत्थर क्यों तोड़ रहे हो? उसने जवाब दिया की उसे पत्थर तोडना अच्छा लगता है, और पत्थर जिससे उसकी कसरत भी हो जाती है. साधु को बहुत हैरत हुई और सोचने लगा की इसको यह नहीं पता की यह ये काम क्यों कर रहा है, परन्तु इसको यह करने मे मज़ा आ रहा है.


वह साधु तीसरे के पास गया जो आराम से अपना पत्थर तोडने का काम कर रहा था. साधु ने उससे भी वही प्रश्न पूछा की आप पत्थर क्यों तोड़ रहे हो? उसने जवाब दिया की हमारे गाँव मे भगवान का कोई भी मंदिर नहीं था. यह  पहला मंदिर बन रहा है, जिसको बनाने के लिए मुझे चुना गया है और इस काम को करके मुझे बहुत शांति मिल रही है. साधु उसकी बातो से समझ गया की यह अपने काम को अच्छी तरह जानता है और मेहनत से काम कर रहा है.


तीनो उदाहरणों से हम कुछ बाते सीख सकते है, जैसे कि जो भी अपने काम को जानता और मेहनत से काम करता है वह अपने जीवन मे  खुश और संतुष्ठ रहेगा। जो सिर्फ काम को बोझ समझ कर करेगा वह कभी भी उस बोझ को अपने कंधो से नहीं हटा सकेगा। जो काम को सिर्फ मजे के लिए करेगा वह कही भी ज्यादा देर तक नहीं टिक पायेगा, उसका दिमाग उससे हमेशा और की डिमांड करता रहेगा।


नोट: हम सबको अपनी ज़िंदगी मे सुधार की जरूरत है और जो भी कर रहे है उसको अच्छे से करने की जरूरत है. हमे लोगो से बात-चित करके सीखना चाहिए की दूसरे लोग किसी काम को इतनी आसानी से कर लेते है जबकि हमे करने मे बहुत समय लग जाता है. अपनी सोच को हमेशा सकारात्मक रखने का प्रयास करे अपनी ज़िंदगी मे चमत्कार जरूर होंगे।


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