मिलने के बाद अलग होने का एहसास

 मिलने के बाद अलग होने  का एहसास 

                                         "पकड़ने में प्यार है और जाने देने में प्यार है।"
                                                             एलिजाबेथ बर्ग
                                        

अलग होने की शुरुवात तो मिलने से ही शुरू हो जाती हैं, जिस प्रकार जन्म के समय ही मृत्यु। इन सब चीजों को अलग नहीं जा सकता जैसे जीवन-मृत्यु, मिलना-बिछुड़ना, रोना-हँसना इत्यादि। इस धरती पर जिस भी चीज़ की शुरवात हुई हैं, उसका अंत होना निश्चित हैं और हमारे चाहने भर से कुछ भी न होगा। अगर हम सोचे की हम समय को रोक कर चीजों को सुधारने की कोशिश करे, वह कभी भी मुमकिन नहीं हो पायेगा। समय को रोकने की शक्ति किसी में नहीं हैं। समय ऐसे ही चलता आ रहा हैं और ऐसे ही चलता रहेगा।

मिलने के बाद अलग होने  का एहसास

अगर हम इंसान की अलग होने की शुरुवात देखते हैं, तब हमें पता लगता हैं यह हमारे जन्म से पहले ही शुरू हो जाती हैं। हम अपने पिता से अलग होकर अपनी माँ की गर्भ में पँहुचते हैं और अपने शुरुवाती नौ महीने वहीं बिताते हैं। अलग होना हमेशा ही दुःख और दर्द से भरा होता हैं। इसलिए जब हम अपनी माँ के गर्भ से अलग हो रहे होते हैं, उनको बहुत ज्यादा दर्द सहना पड़ता हैं। उसकी वजह हैं, माँ को लगता हैं, उनका शरीर का हिस्सा अलग हो रहा हैं नौ महीने के बाद।

मिलने के बाद अलग होने  का एहसास

जैसे-जैसे हम बड़े होने लगते हैं, हम अपनी पुरानी आदतों को छोड़ कर नयी आदतें बनाने लगते हैं. पुराने दोस्तों को छोड़ कर नए दोस्त बनाने लगते है. जो हमारी आदतें या दोस्त बहुत अच्छे होता हैं, अक्सर उनसे अलग होने पर ज्यादा दुःख होता हैं. क्योंकि हमारा दूसरों के मुकाबले उनसे ज्यादा मिलना-जुलना था. जिसके साथ जितना ज्यादा मिलना होगा उनके अलग होने पर उतना ही दुःख भी होगा। हम अक्सर यह भी देखते हैं, जिन लोगो से हमारा मिलना काम होता हैं, उनके अलग होने पर हमे ज्यादा दुःख नहीं होता।


हम और बड़े होते हैं, तब हम भीड़ में जीने लगते हैं, और हमारे अंदर भी यह भीड़ इकट्ठा हो जाती हैं. हम जंहा भी जाते हैं यह भीड़ हमारा पीछा नहीं छोड़ती, यहाँ तक नींद में भी हम भीड़ के ही सपने देखते हैं. जो भी भीड़ सपनो में आ रही हैं, हम उनको खुद बुलाते हैं. हम इस भीड़ से भाग कर भी नहीं जा सकते, अगर हम जंगल में भी जा कर बैठ जाए तब भी यह विचारों की भीड़ अलग ना होगी। हम सब इसी भीड़ में ही उलझे रहते हैं, कुछ से मिलते और कुछ से अलग होते रहते हैं.

मिलने के बाद अलग होने  का एहसास

हम भी इस भीड़ का हिस्सा बन चुके हैं, हम थोड़े समय के लिए भीड़ से अलग होते हैं. थोड़े समय बाद हम फिर से भीड़ में खोने लगते हैं, फ़ोन को बार-बार उठा कर देखना, दोस्तों को फ़ोन मिला कर बातें करना, हम इन सब चीजों से अलग होना ही नहीं चाहते। एक इंसान जो दूसरों से अलग रह कर भी खुश हैं, वह दूसरों साथ भी खुश रहेगा, और जो दूसरों से अलग रह कर भी दुखी हैं वह दूसरों के साथ भी दुखी रहेगा।


जब तक हम खुद को इस भीड़ से अलग नहीं करेंगे हम अपने जीवन में  तरक्की नहीं कर पायंगे। हम अपना जरूरी काम करना शुरू करते हैं, कोई न कोई आ जाता हैं. हम अपना काम छोड़कर उनके साथ चले जाते हैं. हमें अपने आप को हर बार हाँ कहने की आदत से अलग करना होगा, वरना हम अपने जरूरी काम कभी भी समय पर नहीं खत्म कर पायंगे। भीड़ से अलग होने में नुकसान भी नहीं हैं, भीड़ से अलग होने के बाद आप अपने आप से मिलेंगे।


जब तक हम खुद से नहीं मिलेंगे तब हमारी जिंदगी में कुछ नहीं होगा। हमें पता हैं जैसे सुबह होने पर रात का अँधेरा दूर हो जाता हैं. उसी तरह जब हम खुद से मिलेंगे हमारी जिंदगी में बहुत की नकरात्मक चीजें खत्म हो जाएंगी। एक बात बताना चाहता हूं कोई भी हमेशा हमारा साथ नहीं दे सकता जैसे मरने पर कोई हाथ नहीं पकड़ता। जिंदगी में अकेले आये थे और अकेले ही जाना है, मरने से पहले बहुत से लोगो से मिलना और अलग होना इस धरती पर.


हम सब लोग अपनी जिंदगी में एक जगह से दूरी जगह बहुत घूमते हैं, और हर माध्यम से घूमते हैं कभी कार, जहाज, बस, रेलगाड़ी इत्यादि। इस सफर में हम बहुत लोगो से मिल चुके होते हैं. हम यह भी देखते हैं जब उनके स्टेशन आते हैं, वह उतर रहे होते हैं हमें कुछ देर का दुःख होता हैं, पर हम फिर भी अपना सफर जारी रखते हैं. हमारा भी दिल कहता हैं, ये इंसान अच्छा था, अगर थोड़ा और समय मिल जाता तो अच्छा रहता। ये बात याद रखने वाली हैं, जिसकी मंजिल आती जाएगी वह उतरता जायेगा हम उन्हें नहीं रोक सकते।


अगर हम कार पर एक सफर पर निकले और रास्ते में कार का पहिया पंचर हो जाए, हम उसको बदल कर नया पहिया लगा कर अपने सफर को जारी रख सकते हैं. इससे पहिये को दर्द जरूर होगा, मगर हम उसी पंचर पहिये को ही पकड़ बैठ जाये हम कही भी नहीं पँहुच पायंगे। हमें इस बात को समझना होगा की जिसका जितना समय हैं जीवन में उतना समय वह आपके साथ रहेंगे। हमें अपनी मंज़िल तक हर हाल में पँहुचना होगा। ये हमारी बनाई हुई मंजिल हैं, हमारा सपना हैं, ऐसे नहीं टूटने देंगे।


हम इंसानो को एक दूसरे से अलग होने पर ही दर्द होता हैं, उसकी वजह हैं हमने साथ रह कर बहुत अच्छा बिताया था। हमारे साथ समय बिताने पर हमारी भावनाएं एक दूसरे के साथ जुड़ जाती हैं, और जब यह भावनाएं जुड़ती हैं वहाँ दो लोग मिल कर एक बन जाते हैं. हमें दुःख अलग होने का नहीं अपनी भावनाओं के टूटने का होता हैं. जब भावनाएं टूटती हैं बहुत दुःख होता हैं, समझ नहीं आता अब क्या करे. दूसरों के साथ दुबारा से भावनाएं जोड़ने में समय लगता हैं, जब तक यह नहीं जुड़ती इंसान दुःख में ही रहता हैं.

मिलने के बाद अलग होने  का एहसास

नोट: इस दुःख से बाहर निकलने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। यह एक दिन नहीं बनाई तो एक दिन में  अलग भी नहीं हो सकती। हमें खुद को सँभालना होगा और अपने जीवन के लक्ष्य को याद करना होगा। हमें जन्म किसी खास मक़सद से मिला हैं, उसको पूरा करे के लिए जी जान लगा दे या जाने दे. हमारी जिंदगी हमारी जिम्मेवारी कोई हमारी जिंदगी नहीं बदल सकता अगर हम खुद न चाहे।



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