डर और डर के प्रकार
हम सब लोग अपने दैनिक जीवन मे हम बहुत सारी भावनावो को अनुभव करते हैं, कुछ अच्छी होती हैं और कुछ बहुत ही बुरी। हम अपनी भवनाओ से बचकर ना तो भाग सकते हैं और ना ही इनको किसी से छिपा सकते। इन सब भावनाओ से कोई भी बच नहीं सकता फिर वो चाहे बच्चा हो, बूढ़ा हो या फिर जवान। ये भावनाए अक्सर किसी के चहेरे से किसी की शारीरिक गतिविधिओ से पता लग ही जाती है, की वो इंसान कैसा अनुभव कर रहा है। आज हम इस ब्लॉग मे जिस भावना की बात करेंगे, वो है डर। जिससे कोई भी इंसान अनजान नहीं है, जो हम सबको लगता है किसी को ज्यादा और किसी को कम। पर यदि कोई इंसान ऐसा बोले की उसने कभी डर को महसूस ही नहीं किया, वो यक़ीनन झूठ बोल रहा है। हमारे दिन की शुरवात ही डर से होती है, आज ऑफिस लेट तो नहीं हो जाऊंगा? आज बॉस का मूड कैसा होगा? आज दिहाड़ी मिलेगी? वो आज मुझे छोड़ तो नहीं देगी? और कहीं मेरी ज़िन्दगी का आज आखरी दिन तो नहीं? और भी ऐसे बहुत सारे डर है, जो हम अनुभव करते है। ये जो डर वाली भावना है, ये हमारे शरीर के लिए एक अलार्म का काम करती है। जब भी हमे खतरा महसूस होता है, तभी हमारा दिमाग शरीर को सन्देश भेजने लगता ...